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शारीरिक कुरूपता विकार

शारीरिक कुरूपता विकार यानी बॉडी डिसमॉर्फिक डिसऑर्डर(BDD) वह स्थिति है, जिसमें कोई व्यक्ति ज्यादातर समय इस कारण परेशान रहता है कि वह दिखता कैसा है। वह अपने रंग-रूप के बारे में अच्छी सोच नहीं रखता है ।

उदाहरण के लिए, उन्हें इस बात का विश्वास हो जाता है कि मामूली सा दिखने वाला निशान भी इतना बड़ा है कि वह सबको नजर आएगा या उनकी नाक असामान्य लगती है।

यह विकार होने का मतलब यह नहीं है कि वह इंसान बेकार है या आत्ममुग्धता से ग्रस्त है।

कम आत्मविश्वास आखिर कब बॉडी डिसमॉर्फिक डिसऑर्डर में बदल जाता है?

हर शख्स अपने जीवन में एक समय में इस बात से नाखुश महसूस रहता है कि वह दिखता कैसा है , लेकिन इस प्रकार के विचार आमतौर पर आते-जाते रहते हैं और भुला दिए जाते हैं।

हालांकि कुछ लोग जो इससे ग्रस्त होते हैं, उनको दोष युक्त होने का विचार तनाव पैदा करता है और उनका यह विचार जाता ही नहीं।

ऐसे व्यक्ति को लगता है कि वह बदसूरत है या उसमीं कोई ख़राबी है और अन्य लोग उन्हें इसी प्रकार से देखते हैं।

इस विकार के कारण तनाव भी हो सकता है, ऐसे शख्स को आत्महत्या के विचार भी आने लगते हैं।

कौन प्रभावित है?

एक अनुमान के मुताबिक, देश-दुनिया में ऐसे लोगों की संख्या बहुत ज्यादा तो नहीं है, लेकिन अमूमन इससे संबंधित सही सही आंकड़े कई बार सामने नहीं आते क्योंकि इस समस्या से ग्रसित व्यक्ति अपनी बात दूसरों से छुपाते हैं। यह महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले अधिक प्रभावित करता है।

यह विकार किसी भी उम्र के लोगों को प्रभावित कर सकता है किंतु आमतौर पर यह किशोरावस्था में शुरू होता है जब लोग अपने रूप रंग के बारे में बहुत संवेदनशील होते हैं।

यह उन लोगों में पाया जाना आम बात है, जिन लोगों में तनाव और सामाजिक भय का इतिहास हो। यह ज्यादातर OCD के साथ ही हो जाता है या समन्यक्रित चिंता विकार(generalised anxiety disorder) के साथ और साथ ही ईटिंग डिसऑर्डर के साथ भी हो सकता है जैसे कि एनोरेक्सिया या बुलिमिया(anorexia or bulimia)।

इससे ग्रसित व्यक्ति का व्यवहार कैसा होता है?

इस विकार से ग्रसित व्यक्ति:

  • लगातार अपने रूप रंग कि दूसरों से तुलना करते हैं
  • शीशे के आगे बहुत अधिक समय बिताते हैं और दूसरे समय शीशे से पूरी तरह से दूर रहते हैं। बहुत अधिक समय इस बात को छुपाने में लगाते हैं, जिसे वह कोई कमी समझते हैं
  • अपने शरीर के किसी विशेष हिस्से को लेकर परेशान हो जाते हैं (ज्यादातर अपने चेहरे को लेकर)
  • दूसरे लोगों के सामने बहुत चिंतित महसूस करते हैं
  • बड़े संकोची होते हैं और दूसरे लोगों से मदद लेने में इच्छुक नहीं होते, क्योंकि उन्हें लगता है कि दूसरे लोग यह देख लेंगे कि वह बेकार और आत्ममुग्धता से ग्रसित समझेंगे
  • अपने इस कथित दोष के लिए उपचार की तलाश करते हैं, उदाहरण के लिए- वह कॉस्मेटिक्स सर्जरी कराना चाहते हैं, जो कि उनके इस तनाव को दूर करने में नाकाम होता है

अत्याधिक खाना और व्यायाम करना

हालांकि यह विकार OCD(obsessive compulsive disorder) के समान नहीं होता पर उनमें कई समानताएं होती है। उदाहरण के लिए वह व्यक्ति अपने कार्य को कई बार दोहराता है। जैसे कि अपने बाल बनाना मेकअप करना या अपनी त्वचा को मुलायम रखना।

यह आपकी रोज़ाना की जिंदगी पर तो गंभीर असर डालता है और अक्सर आपके काम, सामाजिक जीवन और रिश्तो को भी प्रभावित कर सकता है।

इसके क्या कारण हैं?

आमतौर पर इस डिसॉर्डर के होने का कोई कारण स्पष्ट नहीं है, लेकिन यह अनुवांशिक हो सकता है या कई बार दिमाग में रासायनिक असंतुलन के चलते भी ऐसा होता है।

गुज़रे समय में घटित घटनाएँ भी इस सब में भूमिका अदा करती हैं । उदाहरण के लिए यह विकार आपके बचपन में घटित किसी छेड़छाड़ या आपको डराने धमकाने की किसी घटना का नतीजा हो सकता है।

मदद लेना

यदि आपको लग रहा है कि आप इस विकार से ग्रसित है तो आपको अपने डॉक्टर से मिलना चाहिए।

वह इस बात पर विचार विमर्श करेंगे कि आपकी स्थिति कितनी तनावपूर्ण है और आपकी जिंदगी इससे कितनी प्रभावित हो रही है। इस बात की जांच करेंगे कि आपको इनमें से कौन सी स्थिति है:

  • कम गंभीर शारीरिक कुरूपता विकार(mild BDD) - इसमें लक्षण तनावपूर्ण तो होते हैं किंतु आप इन्हें संभाल लेते हैं और अपनी रोज़मर्रा की जिंदगी में आसानी से चलते रहते हैं
  • अधिक गंभीर विकार(more severe BDD)- इसमें लक्षण बहुत ज्यादा तनावपूर्ण होते हैं और आपकी रोज़मर्रा की जिंदगी को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं

इससे आपके डॉक्टर को भी आप का सही इलाज निर्धारित करने में मदद मिलेगी।

इसका इलाज कैसे होगा?

पहला चरण- CBT और स्वयं सहायता

डॉक्टर आपको शुरुआती तौर पर CBTऔर स्वयं सहायता की किताबें या कंप्यूटर प्रोग्राम की सलाह दे सकते हैं।

CBT एक बातचीत की थेरेपी है जो आपको अपनी सोच और व्यवहार में बदलाव करके समस्या को काबू में करने मैं मदद करती है। आप अपने डॉक्टर के साथ कुछ लक्ष्यों को निर्धारित करने पर सहमति बना सकते हैं। उदाहरण के तौर पर एक लक्ष्य बना सकते हैं, जिसमें आप अपने रूप रंग को बार-बार जाँचना बंद करें।

कुछ लोगों को स्वयं सहायता समूह से जुड़ने पर लाभ हो सकता है जिसमें उन्हें इसी बीमारी से ग्रसित लोगों से भावनात्मक जुड़ाव और व्यवहारिक सलाह मिलती है।

दूसरा चरण- एंटीडिप्रेशेंट्स(antidepressants)

यदि CBT और स्वयं सहायता के तरीके नकारा साबित होते हैं तो आपको अधिक प्रभावशाली CBT की सलाह दी जा सकती है या SSRI अवसाद रोधी दवाओं (संभवतः फ्लुओसेटीन, antidepressant probably fluoxetine) की। इन दोनों के संयोजन की भी सलाह दी जा सकती है।

SSRI को प्रतिदिन लेना होता है और इसके असर को शुरू होने में 12 हफ्ते लग सकते हैं।यदि यह असरदार साबित होता है तो आपको यह इलाज 12 महीने तक लेना होगा ताकि आगे सुधार जारी रहे। इतना ही नहीं इस विकार को दोबारा वापस आने से रोक सकें।

जब आप का इलाज पूरा हो जाए और आप के लक्षण काबू में आ जाए तो SSRI को धीरे धीरे कम कर दिया जाता है ताकि बंद करने के दुष्प्रभाव कम हो।

30 साल से कम उम्र के व्यस्कों को SSRI लेते समय सावधानी पूर्वक निगरानी की आवश्यकता होती है क्योंकि इलाज के शुरुआत में आत्महत्या के विचार या खुद को नुकसान पहुंचाने से जुड़े ख्याल आने का खतरा रहता है।

आपको इस विकार के इलाज के लिए विशेष प्रकार के अस्पताल भेजा जा सकता है।

तीसरा चरण - क्लोमीप्रामाइन या एंटीसाइकोटिक(Clomipramine or antipsychotic)

यदि आपको दो या दो से अधिक SSRI अवसाद रोधी दवाओं से भी फ़ायदा नहीं होता, तो आपको एक अन्य प्रकार की एन्टीडिप्रेसेंट दवाएँ जैसे क्लोमीप्रामाइन(clomipramine) या कम खुराक वाली एंटीसाइकोटिक(antipsychotic) दवाएँ दी जा सकती है। इन दवाओं के दुष्प्रभाव के बारे में अपने डॉक्टर से बात करें।

सामग्री का स्त्रोतNHS लोगोnhs.uk

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